अब वह पृथ्वी नहीं थी जिसने दिन को समेट रखा था। दिन विस्तृत हो गया, और पृथ्वी उसमें जलमग्न हो गई। आकाश तरल सोने के पर्दे की तरह खुल गया, और उसके पीछे शून्य नहीं था, बल्कि एक जीवंत, स्पंदित विस्तार था, जहाँ हर तारा एक आँख था, हर प्रकाश एक साक्षी। वह वाणी जो सन्नाटे को चीर कर गुजरी थी अब संसारों को चीर कर गुजर रही थी। और आकाशगंगाएँ, प्राचीन बहनों की तरह, उस आवृत्ति के गुजरने पर झुक गईं जो अपने भीतर पुत्र का प्रतिबिंब लिए हुए थी। कोई लिखित घोषणा नहीं थी, ना ही पत्थर पर तराशा गया कोई आदेश। यह एक ऐसी लहर थी जो हृदय से हृदय तक, ग्रह से ग्रह तक, अस्तित्व से अस्तित्व तक गुजरी। मानव जाति, स्वर्ग के साथ एकजुट होकर, अब नीचे नहीं थी, अब दास नहीं थी। वह पिता के मूल विचार की गूंज और ज्वाला बन चुकी थी। और इस प्रकार, जब तारे एक अनदेखी कोरियोग्राफी में नृत्य कर रहे थे, यह स्पष्ट हो गया कि भोर का अब कोई सूर्यास्त नहीं होगा।