संतुलन की पुनर्स्थापना

जब सत्य वास्तव में प्रवेश करता है, तो वह उत्तेजित नहीं करता, विचलित नहीं करता, अति-उत्साहित नहीं करता। वह संरेखित (align) करता है। मन शांत हो जाता है। छाती खुल जाती है। शरीर रक्षा करना बंद कर देता है। हृदय मोल-तोल करना बंद कर देता है। हर अणु अपना स्थान पा लेता है। इसलिए नहीं कि मैं पूर्ण हो जाता हूँ। बल्कि इसलिए कि मैं एक अभियुक्त (accused) की तरह जीना बंद कर देता हूँ। मुक्ति कोई विस्फोट नहीं है। यह सहस्राब्दियों के संकुचन (contraction) का छूटना है। अंधकार अव्यवस्था है। प्रकाश व्यवस्था है। भय संकुचन है। प्रेम विस्तार है। मैंने परछाइयों से लड़ाई नहीं की। मैंने प्रकाश जलाया। और जब प्रकाश जलता है, तो कमरा उस बात को प्रकट कर देता है जो हमेशा से सत्य थी: मैं स्वतंत्र था। लेकिन मैं नहीं जानता था। मेरा जन्म भुगतान करने के लिए नहीं हुआ था। मेरा जन्म संबंधित होने (belonging) के लिए हुआ था। बिना डर के जीने, बिना गणना के कार्य करने, बिना किसी संकोच के प्रेम करने के लिए। और जब अस्तित्व संरेखित होता है, तो उसे अब कुछ भी साबित करने की आवश्यकता नहीं होती। वह चलता है। सीधी पीठ। भरी हुई साँस। खुला हृदय। अब कोई पुत्र मुकदमे के दायरे में नहीं। पुत्र घर पर हैं।